ज़हर…

“कभी रीती भाभी के घर जाकर देखो कितने अच्छे से रखती हैं वो घर, “उसके कमरे में मोनू के बिखरे खिलौने रेनू ने मुँह बनाकर अपनी छोटी भाभी निधि को सुनाने में एक मिनट भी नहीं सोचा|

जीजी उनके बच्चे बड़े हो गए हैं ,तो उनमें एक जिम्मेदारी आ गयी है ,अभी मोनू छोटा है तो मेरा सारा ध्यान उसपर ही लगा रहता है ,ध्यान तो रखती हूँ पर इतना हो नहीं पाता कुछ कमियां रह जाती है , बुझे मन से निधि ने कहा |

” ठीक कहती हो भाभी पर बच्चे तो सब पालते हैं ” बहुत तरीके से उसके तर्क को धूल चटा कर चलती बनी ननद रानी और निधि को छोड़ गयी बहुत सारे सवालों के साथ !

क्यों बोल नहीं पाती वो ? क्यों ननद जो उसी शहर में रहती है ,बिना बुलाये धमक जाती है ,फिर छुट्टी का वो दिन उसे कितने बातों का ज़ख्म दे जाता  है | वो भी चिढ़कर बिन बात मोनू को एक दो चपत लगा देती है | पति से भी कुछ कही सुनी हो ही जाती है | अच्छे खासे मूड का सत्यानाश हो जाता है | कहीं इन सबकी वो खुद जिम्मेदार तो नहीं ???

“भाभी यह इतने सारे कपड़े फैले हुए हैं ,इन्हें समेट दिया करो ” रेनू ने आते ही अपना एक्सपर्ट कमेंट दिया |

“दीदी आपको पता है मोनू को दो दिन से बुखार है ,मैंने आपको कॉल भी किया था तो आपने “मूवी में हूँ” कहके तुरंत फ़ोन रख दिया था | दो राते आँखों में काटी हैं हमने ,आपके भैया भी ऑफिस के कामों से बाहर गए हुए हैं | अभी सूखे कपड़े उतार कर रखें है जीजी ,समेट तो दूंगी ही| वैसे भी दी घर में कभी कभी सामान बिखरे हो सकते हैं ना ? सुबह से संभालती हूँ तो शाम होते होते मोनू घर में खिलौने बिखेर ही देता है फिर वापिस हम माँ -बेटे उसे रख भी देते है | अगर आपको बिखरे कपडे बुरे लग रहे है तो समेट दीजिये ,तबतक मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूँ ,या फिर मुझे जब समय मिल जायेगा मैं कपडे समेट लूंगी | आप टेंशन ना लो | ” मन में छिपी बातों ने आज शब्दों का रूप बड़ी नम्रता से ले लिया था | ”

अपनी ननद को अवाक छोड़ वो उनके लिए चाय बनाने चल पड़ी | उसने सोच लिया था कि वो किसी का अनादर नहीं करेगी पर हां किसी की कड़वी बातें नहीं सुनेगी और ना ही उन कड़वी बातों के ज़हर का असर अपने रिश्ते पर होने देगी |अगर कहानी पसंद आयी हो  तो पोस्ट को लाइक और अपना कमेंट ज़रूर दें | आपके सुझावों का भी इंतज़ार रहेगा ||images

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