श्यामली

उसका सांवला रंग जैसे सूरज की अरुणिमा में लरजने लगा था | आज शायद सूरज भी उसकी चुटकियाँ लेने पर तुला था|

बाबा का साया तो बचपन से उसके सर पर से उठ गया था ,अम्माँ के एक्सीडेंट में हुई मौत ने उसे बिलकुल अकेला कर दिया था ,ऐसे मामाजी उसे अपने साथ ले आएं | उसे कितनों ने कहा दो बेटियों के बाप मामा जी उसे इसलिए घर ला पाए क्योंकि उसकी अम्माँ और बाबा ने उसके लिए अच्छे पैसे रख छोड़े थे ,पर उसके लिए यह सब कोई मायने नहीं रखता ,जब अम्माँ -बाबा ही नहीं रहे तो रुपयों का सहारा क्या किसी की ज़िंदगी बदल सकता है ?

मामा की दोनों बेटियां बहुत प्यार देती उसे और मामी भी उससे अच्छा व्यव्हार ही रखती| अम्मा ने उसे पेंटिंग सीखवायी थी और जब भी वो उन्हें याद करती ,शाम को अकेले गार्डन में वो पेंटिंग ही बनाया करती|

ऐसे में पड़ोस में रह रही उसकी मामी के खास दोस्त बिमला आंटी के बेटे विवेक की नज़र उस पर पड़ी | विवेक के बारे में वो सिर्फ इतना जानती है कि विमला आंटी उसके मामी से विवेक की सिफारिश सोनिया दी के लिए कर रही थी ,पर विवेक बैंक में क्लर्क था और उसकी मामी अपने गोरी चिट्टी बेटी को उसके पल्ले बांधना ही नहीं चाहती थी| जब भी बात उठाती बिमला आंटी वो बात टरका देती ,इसके अलावा दोनों की हर बात पर छनती थी|हल्की हवा में img-20180812-5b70102412030  गालों से अठखेलियां करते उसके बाल जैसे आज विवेक को भी शरारतें करने पर मज़बूर कर रहे थे | अपनी बॉलकोनी से उसने जब उसे देखा तो उसे लगा कि गार्डन में अपने कैनवास पर एक नदी का चित्र उकेरती यह सावंली सी लड़की जैसे उसके मन में गहरे छाप छोड़ते जा रही थी | पेंट ब्रश के हल्के हाथों के स्ट्रोक्स से वो क्या शेड देने की कोशिश कर रही थी उसे दूर से वो तो पता नहीं चल रहा था ,पर हाँ ,उसे तो वो स्ट्रोक्स उसके क़दमों की थाप ज़रूर लगने लगे थे जो बिन बुलाये मेहमान की तरह उसकी और बढ़ते ही जा रहे थे |

बार-बार हवा से अठखेलियां करते उसके बाल उसकी कल्पना के आड़े आ रहे थे और वो नदी में हिचकोले खाती नाव को सही आकार ही नहीं दे पा रही थी | अपनी घनी केश राशि को जुड़े में बांधते वक़्त उसकी नज़रें ,विवेक की एकटक देखती निगाहों से जा मिली और हड़बड़ा कर ब्रश हाथ से छूट गया उसके | खामोश ही रहती थी श्यामली ,आज भी इसका जवाब ख़ामोशी से दिया ,उसने अपनी पेंटिंग समेटी और घर के अंदर चली गयी | फिर छुट्टी के कई दिन विवेक ने उस बालकनी में बिना वजह गुज़ारी पर गार्डन हमेशा मुँह चिढ़ाता ही मिला | माँ से बातों बातों में जान पाया कि वो उनकी सहेली रमा काकी के ननद की बेटी है जो अब अपनी माँ के मौत के बाद वहीँ उनके साथ रहती है | और उसके शांत स्वाभाव से जुडी बातों ने उसके मन में अधिकार जमाना शुरू कर दिया |

आज उसका रिजल्ट आया था और सारा मोहल्ला जैसे उसके घर टूट पड़ा था | उसने ऑफिसर बनने का ऑफिशियल एग्जाम जो पास कर लिया था | उसकी माँ के तो पैर जमीन पर नहीं थे | विमला को अब पता था कि उसके बेटे के लिए उलटे सीधे रिश्ते लाने वाले अब मुँह की खाएंगे |

“रमा को भी वो करारा जवाब देगी ,जब जब उसने सोनिया की बात चलाई है उसने बात पलटी है ,क्या वो नहीं जानती ? सखी है तो क्या आज उसको वो सही जवाब देगी | ” विमला काकी का मुँह व्यंग से टेढ़ा हो गया “आज तो उसके घर पंडितजी रजिस्ट्रार की एकलौती बेटी का भी रिश्ता ले आये थे ,सब ठीक रहा तो समाज में नाक ऊँची हो जाएगी ” मुँह पर एक गर्व भरी मुस्कान आयी | औरतों के बीच में बैठी बिमला आंटी की तन्द्रा रमा की बात से टूटी|

” हीरा है हीरा विवेक,विमला ,मैं तो शुरू से जानती थी | अब बताओ कब बना रही हो मुझे समधन ?”रमा ने खींसे निपोरी|

“ऐसा है रमा ,चाहत तो मेरी भी यही थी ,पर विवेक की पसंद कोई और ही निकली ” बात को रफा दफा करने के लिए अलग तरह से घुमा दिया उसने | विवेक ने बातों की डोर वहीँ से थामी | ” रमा काकी समधन तो आप बनी ही समझो बस मेरी शादी अपनी भांजी से करवा दो आप “हाथ जोड़कर खड़ा हो गया उसके सामने विवेक | कांटा निगलते बने न उगलते ,इतने लोगों के सामने दोनों सहेलियां निरुत्तर थी |

“हम इनके मामा से पूछ लेते है फिर बतातें है ” कहकर जल्दी में उठ गयी रमा ,पैर मन भर भारी हो चले | यह बेजुबान लड़की से कब दिल की इतनी लम्बी चौड़ी बात कर ली उसने” हैरान थी वो |

बर्तनों की खूब उठा पटक हुई दोनों घर में पर ना श्यामली के मामा माने ,न विवेक | श्यामली की विदाई तो हो गयी और गृह प्रवेश भी | कोई तूफान इस चुप्पी में नहीं छिपा था ,इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता था |

विवेक की माँ और बहन रीती के लिए एक झटके से कम नहीं था | जहाँ एक के अरमानों को झटका लगा तो अगले के सम्मान पर | दोनों के लिए एक स्टेटस सिम्बल था | सहेलियों की शादियों में हमेशा मीन मेख निकालने वाली रीती के लिए एक सांवली लड़की को भाभी के रूप में स्वीकार करना बहुत मुश्किल था | शादी में आयी सहेलियों की हंसी में छिपी व्यंग्य की झलक से अंदर में आग सी लगा रखी थी और विमला के तो सारे सपने चकनाचूर हो गए थे| उसे लगा बेटे ने उसे जीवन भर का दुःख दे दिया हो ,बेटे का गुस्सा बहु पर उतरता रहता |

श्यामली के लिए कुछ आसान नहीं था | कुछ दिनों पहले हुई अम्मा की मौत से बिलकुल अकेली पड़ी श्यामली को जो प्यार का सहारा मिला था ,बस कुछ दिनों का ही था | मामा के समझाने पर कि उसे यह शादी कर लेनी चाहिए , मामा की आँखों में झलकते आश्वासन ने उसके मन में कोई संदेह नहीं छोड़ा था | “बचपन से देखा है उसे ,हीरा है हीरा शीयु ,थोड़ी तकलीफ ज़रूर होगी वहां उसके घर पर तू अपने स्वाभाव से सबका दिल जीत लेगी ,बात मान ले मेरी ” मामा की बातें जैसे विदाई में अपने आंचल में गांठ बांधकर लाई थी वो !

लोगों की बातों से तप्त ह्रदय को अपने प्यार की शीतलता से शांत कर देता उसका अनाड़ी पिया ! “कुछ बात हो तो मुझे ज़रूर बताना छिपाना नहीं “उसकी आँखों में झांकता उसका चेहरा उसको आत्मविश्वास से दीप्त कर देता | पता नहीं कैसे उसे किसी बात का अहसास हो चला है ,उसके सामने सब ठीक ही रहता पर तूफान उसके ऑफिस जाने के बाद ही आता | विवेक के बाबा को भी ऐसी शादी मन नहीं भायी थी पर आजकल सासु माँ को कभी कभी डपट भी दिया करतें | पर कमोबेश ज़िंदगी इतनी आसान नहीं थी ,पर वो आसान भी कब थी ?

क्या बोलती वो ? सर हिला कर “ना “कह देती वो ,फिर उसका हाथ श्यामली को अपने बाँहों के मज़बूत घेरे में ले लेता और पिया के बाँहों में पिघलती श्यामली को भला फिर दुनियां की बातें कैसे याद रहती |

ससुर जी के दोस्त के बेटे की शादी थी ,अम्माँ की तबियत थोड़ी ठीक नहीं थी वो जा नहीं पायी | रीती भी सहेलियों के साथ कॉलेज ट्रिप पर केरल निकली हुई थी | ऑडिटिंग की वजह से विवेक भी आजकल घर देर से ही आता था | वैसे सम्बन्ध मामी से बहुत अच्छे नहीं रहे पर सोंचा था कि अगर अम्मा की तबियत बिगड़ी तो मामी से ज़रूर पूछ लेगी |

शाम से बुखार बढ़ने लगा था ,विवेक का मोबाइल स्विच ऑफ था ,मामी के पास नंगे पांव दौड़ती चली गयी वो ! बदहवास श्यामली को देख जैसे मामी का सारा गुस्सा पानी हो गया ,बात उसकी पक्की सहेली की भी थी |

“नालायक है तू बिमला कहती हूँ उम्र हो गयी है ,पर आग लगी रहती है तुम्हे ,पंखा नहीं बंद होता तुझसे ? प्यार से झिड़कती मामी और झिड़कियाँ खाती सासु माँ ,श्यामली के लिए यह सब कुछ नया नहीं था |

बस मामी के निर्देशों पर सासु माँ का ध्यान रखा पूरी रात उसकी ऑंखें नहीं झपकी | वही कुर्सी पर विवेक को भी नींद आ गयी | सुबह सासु माँ का बुखार चला गया था और अपने साथ ले गया था वो गुस्से की गर्मी भी !उसके माथे पर अपना आशीर्वाद का हाथ रखा तो आज उसे अपनी अम्मा याद आ गयी |ज़िंदगी इतनी कठोर भी नहीं थी |

रीती उसकी ननद आज भी उससे दूर ही रहती पर माँ से सारा हाल जानने के बाद थोड़ी शांत ज़रूर हो गयी थी | फाइनल एग्जाम कुछ एक महीने बाद थे पर प्रक्टिकल्स कॉपी का सबमिशन पहले था और अपनी लापरवाही में फिजिक्स प्रक्टिकल्स के ड्राइंग्स उसने बनाये ही नहीं थे | सबकी डांट पड़ रही थी उसे और ऐसे में श्यामली ने सबके सामने हाथ जोड़ दिए कि अब कुछ ना बोला जाये | अपने कमरे में जबरदस्ती ले आयी रीती को |

बेमन से आयी रीती को जब उसने ड्रॉइंग्स से जुड़े छोटे छोटे टिप्स दिए तो वो बस उसे देखते रह गयी | विवेक का कमरा -निकाला हो गया था और रीती और श्यामली फिजिक्स की कॉपी ख़तम करने में जुड़े थे | बीच रात में बनी कॉफी के बीच कब दोनों अच्छे दोस्त बन गए ,दोनों को भी पता नहीं चला ,हाँ ,उनकी खीखी खीखी की आवाज़ बाहर आती तो विवेक डपटता ,कमरे से बाहर ,दीवान पर सोता ,बीबी से दूर विवेक की डपट थोड़ी तेज़ ही होती |

आज की रात सुरमई हो चली थी | हल्की सी बहती हवा ने फिर से उसे छुआ था | एक शीतलता ने उसके तन और मन को कही अंदर तक भींगा दिया था | इतने दिनों की तपन को सुकून सा आ गया था | आज वो अपने कमरे के उसी बालकोनी में खड़ी थी जहाँ से विवेक ने उसे पहली बार देखा था | उसके बंधे हुए बालों को एक झटके से खोल दिया आज विवेक ने ,चौंक कर पलटी तो पाया वो अपने अनाड़ी पिया के बाँहों में थी | घरवालों का इतना स्नेह और पिया की बाँहों में महफूज़ श्यामली का शायद आज ही गृहप्रवेश हुआ था |अगर कहानी पसंद आयी हो तो पोस्ट पर अपने कमेंट देना ना भूलें |

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