रंगोली सी हो , तुम !

रंगोली सी हो ,
तुम ,
घर को ,
घर बनाती
हो ,
गर्मजोशी सी हो ,
तुम,
आगंतुकों को ,
नेह का स्पर्श ,
दे जाती हो !
रिश्ते का अनुबंध ,
सा बनता है ,
घर मेरा घर सा लगता है !

तुम जब ,
प्यार परोसती ,
हो गर्म फुलकों ,
में ,
सच कहूं ,पेट क्या?
मन भी तृप्त,
हो जाता है |
जानती हो ,
तुम हो तो ,
घर मेरा ,
घर सा लगता है |

जब संध्या की
बाती ,
तुलसी चौरे ,
पर जलती है ,
इंतज़ार में मेरे ,
जब दो ऑंखें ,
बाहर तकती हैं ,
घर लौटने का ,
मन करता है !
घर मेरा ,
घर सा लगता है |

-अमृता श्री

selective focus photography of woman sitting on green grass
Photo by Joy Deb on Pexels.com

 

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