ज़िंदगी

घडी दो घडी ,
ज़िंदगी ,
तू और मैं ,
सुस्ता लें ज़रा !

सुलझा लूँ मैं ,

रिश्तों की,
गांठो की ,
उलझन ,
तू भी
दौड़ते -भागते
अपने क़दमों पर ,
मलहम लगा ले ज़रा !
तू और मैं ,
सुस्ता लें ज़रा !

आ बैठ कर ,
दो घडी ,
प्यार से बातें कर लें ,
समय के दौड़ते पहिये को ,
हाथो से पकड़ ले !
दो घडी एक दूसरे ,
ढाढस तो बंधा ले ज़रा !
तू और मैं ,
सुस्ता लें ज़रा !
-अमृता श्री

life

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