मैं एक बच्चे के गुल्लक सा

मैं एक बच्चे के गुल्लक सा ,

सिक्कों सी , है भावों की खनखनाहट मेरी ,
बाहर निकलने की है, एक छटपटाहट मेरी |

गुल्लक सा खनकता हूँ ,
दिल में कई ख्याल रखता हूँ ,
नजरों से ही तुझे कई बातें कहता हूँ !

जैसे कोई बच्चा गुल्लक को हिलाता है ,
कान के पास रखकर पैसे का अंदाज़ भी लगाता है ,
जोर देने पर भी वो एकाध सिक्का ही बस पाता है !

ऐसा ही महसूस होता है मुझे ,

मैं भी भावों का एक गुल्लक ही तो हूँ ,
कोशिश करता हूँ कि आज यह बोलूंगा ,ऐसे बोलूंगा ,
पर तुम्हें देखता ही रह जाता हूँ ,ख्यालों में बस खो सा जाता हूँ !
शायद यह गुल्लक तोड़ दूंगा एक दिन!
भावों को खुला छोड़ दूंगा उस दिन !
    -अमृता श्री 52426222_127233218345164_6243072012324130259_n

Advertisements

4 Comments

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s