साँझे सपने

कभी इस हवेली में कितनी आवाज़ें गूंजा करतीं और इस हवेली की बहु थी सुकुमारी 16 वर्ष की नववधू कृष्णा! आंचल को सर पर जमाने की कोशिश में खुद ही उलझ जाती| पति शेखर रोबदार, उम्र में उसका 5 साल बड़ा ,प्यार के रस में भीगा-भीगा सा|

जब भी कृष्णा उससे मिलती, वो उसे छेड़ने से बाज़ नहीं आता| सासु माँ ठसकदार और नौकरों की फौज इसी कोशिश में जुटी रहती कि सासु माँ की नज़र में उनकी कमी ना दिख जाये! ऐसे में बेचारी कृष्णा की क्या बिसात कि वो ज़रा भी इधर से उधर हो जाये| छोटी सी कमर में चाबियों का गुच्छा यूँ लटकाये डोलती कि लगता बस सारा घर उसी के साथ छनक रहा हो , उसके गुच्छे के साथ!

शेखर ने उसे कहा था “सुनो कभी पायलें ना उतारना, उनकी छमछमाहट से तुम्हारे आस-पास होने का भ्रम होता है ” सकुचा कर सर झुका लिया उसने !”

यह निगोड़ी पायलें इतना मधुर स्वर जो निकालतीं है पर किसी को क्या पता ? इससे उसके कोमल पैर कैसी रगड़ खातें हैं, लाल हो जातें है, टमाटर की तरह! खुद में ही बुदबुदा उठी!

खुद से ही बातें करती अपनी दुल्हन को देखकर ऐसा लगा उसे कि वो बस उसे देखता ही जाये| जब उसके गौने की रात होगी तो क्या वो उसे छू भी पायेगा? देखने से भी मैली हो जाती है उसकी दुल्हनियां!

विदा करा कर ले आयी उसकी अम्माँ ,कृष्णा को पर पंडितजी ने गलत समय पर पलटी खाई और बोल पड़े कि करीब सवा महीने बाद ही पत्नी सुख ले सकता है वो ,कुछ ग्रह दशा का फेर है| ग्रह -दशा का फेर हो या न हो ,उसके जीवन पर ऐसा फेर लगा दिया पंडित ने कि एक-एक दिन जैसे वर्षों के लग रहे थे |

और कृष्णा न, वो है ही बुद्धू सी! रोटी गोल करना सीख रही है पर जीवन ने ऐसी शक्ल ले ली है, उस पर तो उसका ध्यान ही नहीं| बेचारी वो भी तो अम्माँ की इतनी बड़ी गृहस्थी में दब कर रह गयी है |

“पर है वो बुद्धू ही ,नज़रों की भाषा जानने में निपट गंवार” शेखर खुद से ही बातें करने लगा| खुद से बातें करते शेखर को देखकर, हंसने की बारी अबकी कृष्णा की थी| फिर से हंस पड़ी|

“ठहर जा ज़रा” चिढ कर बोल पड़ा वो, और फिर कृष्णा लम्बे-लम्बे कदम रख कर ऐसी गायब हो गयी जैसे कोई भूत!

वृंदा जैसे हवा का कोई अलमस्त झोंका …………… जैसे बरसात की कोई उफनती नदी अपने किनारों को तोड़ने को तत्पर ,बात जैसे कि कभी खत्म ना हो, ऐसी थी वृंदा, राधे काका की बिटिया, कृष्णा बहु से कोई दो एक साल बड़ी| आजकल बीमार चल रहे है राधे काका तो हवेली में दूध पहुंचाने की जिम्मेदारी वृंदा के सर है|

वो जैसे कोई अलमस्त हवा को वो झोंका जो बार-बार खिड़कियों के बंद किये पल्ले पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक देता, और अंदर कमरे में आने को बैचैन ! हवेली की हर चीज़ को छूकर ,देखकर ,जानने की अदम्य चाहत ! हवेली की मालकिन की चुस्त दृष्टि पड़ते ही छुप कर किसी कोने में घुस जाती वृंदा ,जैसे उसकी चोरी को पकड़ लिया हो किसी ने! पर अपनी नज़रों का क्या करे ,वो तो बस हर लम्हों को आत्मसात करने पर तुली रहती है|

“यह बड़ी सी हवेली जैसे इसमें सारा गांव समा जाये, हाय आंखें फिर से बड़ी होने लगीं| ठुड्ढी पर हाथ रखकर बस देखते ही रहने का मन करता|

“क्या देख रही हो इतने ध्यान से” कृष्णा की मीठी आवाज़ उससे टकराई तो चौंक कर वृंदा ने उसे देखा|

“हाय कितनी प्यारी हो बहु, नज़र ना लगे| कैसे बड़े-बड़े झुमके हैं तुम्हारे ? कैसे संभाल पाती हो? इतनी बड़ी हवेली में कभी गुम भी हो जाती हो? हाय यह सोने की पायलें कितनी प्यारी हैं! इतने सवालों के साथ उसपर टूट पड़ी वृंदा |

छोटे ब्राह्मण ख़ानदान से आयी कृष्णा ने भी हवेली की महिमा को अभी जाना ही कितना था ? उसके बाउजी की ग्रहों की गणना कर दी गयी सलाह पर जब सासु माँ बगल के गांव का केस जीत गयी तो अम्माँ को बड़ा भरोसा हो आया इस गरीब ब्राह्मण पर| जबसे ब्राह्मण को जाना तो उसकी बिन माँ की बिटिया कृष्णा भी उनके मन में उतरती चली गयी ,फिर बड़े चाव से उसे अपनी बहु बना कर ले आयीं वो| ब्राहण ने तो इसे अपने भाग्य का ही वरदान समझा, जैसे कई तीर्थ एक साथ कर लिए हों| उसकी बिन माँ की बिटिया ने कभी बोलना ही नहीं सीखा था|

कृष्णा भी अभी हवेली की दीवारों को पहचानने की कोशिश में लगी थी |

लाड से वृंदा का हाथ पकड़ कर बोल पड़ी “ना रे ना, मैं भी यहाँ, तुम सी नयी नयी ही हूँ, अभी सब कुछ देखा ही कहाँ है?

इतने बड़े घर की बहु कृष्णा को सखी बनाते वृंदा को फिर देर ही कहाँ लगी ? जल्द ही दोनों पक्के दोस्त बन गए| वृंदा के गंदे से दोने में लाये गए खट्टे मीठे बेर के सामने कृष्णा को घर के पकवान फीके से लगते| कभी चटपटी इमली, कभी खट्टे आमों के साथ दोस्ती का यह रिश्ता पक्का सा हो गया | बिन माँ की भोली कृष्णा को वृंदा ने कितना कुछ सिखा दिया था|

फिर पिया मिलन की बेला आयी तो नाज़ुक सी कृष्णा जैसे शेखर की बाँहों में पिघलती चली गयी| सांसों ने आज नए तार छेड़ दिए थे,ज़िंदगी आज नया सरगम सुना रही थी| किसी चातक की तरह शेखर की आंखें उसे ढूंढती और वो किसी समंदर सी उससे मिलती|

ज़िंदगी के इस दौर की साक्षी थी उसकी पक्की सहेली वृंदा ,उसने ही तो इस अल्हड लड़की को एक युवती बनते देखा था| उसकी हर छोटी बड़ी उलझने सुलझाते सुलझाते वो कब इस प्रेम कहानी में देवदूत बन गयी ,उसे खुद भी पता नहीं चला| कब कृष्णा से उसके सपने सांझे हो गए उसे भी पता नहीं चला| मूक सी कृष्णा वाचाल हो चली थी और वाचाल सी वृंदा मूक !

समय जैसे रेत सा फिसलता गया| आठ महीनें गर्भवती कृष्णा अपनी बुआ के घर बच्चे को जन्म देने गयी| यह सिर्फ रस्म निभाने जैसा ही था ,क्योंकि अपनी लाड़ली बहु के लिए उन्होंने वहाँ पूरा इंतज़ाम किये हुए थे| सभी को सख्त ताकीद दी गयी थी कि कृष्णा की ज़रूरतों में कोई कमी नहीं रखी जाये | हर दिन वो उससे मिलने उसकी बुआ के घर जाया करतीं| आज पता चला कि कृष्णा को उल्टियां हो रही हैं, आठवें महीने में उल्टियां कुछ ठीक नहीं सोच कर, बेसमय दोपहर में ही अम्मां जी कृष्णा से मिलने चल पड़ीं| शेखर भी उनके साथ ही था|

अहा ! इतना बड़ा पलंग ! कैसा लगता होगा इस गद्देदार बिस्तर पर सोकर ,वृंदा के लिए इस बिस्तर का मज़ा लेने का यह सुनहरा अवसर था| बिस्तर पर खूब उलटी-पलटी और फिर न जाने कैसे अलसाई सी इस दोपहर ने उसे नींद में घेर लिया| अम्मां वहीं शाम तक रुक गयीं पर शेखर लौट आया था | बेड पर वृंदा को सोते देख देखता ही रह गया| लहंगा थोड़ा ऊपर उठ गया था , वृंदा की गोरी पिंडलियाँ चमक रही थीं| किसी बच्चे की सी नींद में खोई वृंदा को दीन-दुनिया का आभास ही नहीं था| एक अन्जानी सी भावना ने शेखर को भी घेर लिया| पत्नी सुख से वंचित शेखर का मन एक बार डगमगाया ज़रूर पर मन के हाथों चरित्र गँवाना एक घटिया बात होती | अलमारी से कृष्णा का कम्बल उसे उढ़ाकर वो कमरे से बाहर निकल आया |

शाम को सासु माँ कृष्णा का हाल बताने शेखर के कमरे में आयीं तो वृंदा को पलंग पर सोते देख होशो हवास खो बैठीं| चिल्लाते हुए उसे पलंग से उतार कर घर से बाहर निकाल दिया| शेखर को भी खरी-खोटी सुनाई| यह बात घर के नौकरों से भी छिप कर न रह सकी| बिना कोई आधार जाने ,जितनी मुँह थे उतनी बातें बनीं| बड़े लोगों पर किसकी ऊँगली उठती ,वृंदा ही उनका निशाना बनी| कुछ उससे जलते थे, कुछ उसे हवेली और बहु की दोस्ती के काबिल भी नहीं समझते थे| फिर वृंदा की सुनता भी कौन?

शेखर ने जब अम्माँ को सारी बात बताई तब जाकर थोड़ी ठंडी पड़ी वो !

पर वृंदा पर हवेली आने की रोक लग गयी| राधे काका को बोलकर आनन- फानन में उसकी शादी कर दी गयी, पड़ोस के गांव में उसका दूल्हा एक मैकनिक था |

जब 5 महीनें के रोहित को लेकर कृष्णा आई ,तो हर जगह उसकी आँखों ने बस अपनी सखी को ढूंढा| पर जैसे पुरे घर में एक चुप्पी सी छा जाती जब भी वृंदा का जिक्र होता| जब उसकी खोज वृंदा के लिए बढ़ गयी तो अम्मां से जमके डांट पड़ी कृष्णा को| पर कहते हैं न दोस्ती पक्की हो और खोज सच्ची तो बात दबी नहीं रह सकती |

घर की दासी इमली ने नमक मिर्च लगाकर जो वृंदा को कहानी सुनाई, जिसमें सच छोड़ कर सब था |

“हाथ ना लगाना मुझे ,तुम्हारे हाथ और दिमाग दोनों गंदे हो गए हैं| मैंने तुम्हारे बच्चे को जन्म दिया और तुमने मुझसे ही दगा किया और वो भी उसके साथ जो मेरे दिल के इतने करीब थी….” आँखों से आंसू निकल ज़रूर रहे थे पर दिल की आग बढ़ती ही जा रही थी |

शेखर ने लाख दुहाईंयां दीं ,पर उसने किसी की नहीं सुनी| सारी परिस्थितियां वृंदा और शेखर के गलत होने का इशारा कर रही थीं| वृंदा की आनन-फानन में की गयी शादी, ख़बर के पक्की होने पर एक मुहर सी लग रही थी |

“अब तुम सिर्फ मेरे बच्चे के पिता हो, तुमसे मेरा बस इतना ही नाता है।” बोलते हुए अपने कमरे से निकल गयी| अब वो अपना कमरा अलग करकर रहने लगी| सासु माँ ने बहुत समझाया पर टूटी हुई कृष्णा ने फिर किसी की ना सुनी| रोहित को माँ-बाप का प्यार टुकड़ों में मिला |

कृष्णा का बस चलता तो घर छोड़ जाती वो, पर सासु माँ की जमींदारी की ठसक और रुतबे के आगे उसकी एक ना चली| जिस्मों के साथ-साथ दिलों के दायरे बढ़ते गए| ऐसे दो साल निकल गए |

पता चला कि वृंदा का पति शादी के इतने दिनों के बाद पहली बार मायके छोड़ कर गया है| मन में एक तिक्तता सी आयी और कृष्णा अपनी सखी की खबर लेने बीच दोपहर, धीरे से पीछे दरवाजे का सांकल खिसका कर पैदल ही चल पड़ी, सांकल की खन्न की आवाज़ ने शेखर की नींद भी तोड़ दी|

रोहित पालने में सोया पड़ा था और रोहिणी बाई वहीँ नीचे सोई थीं| आखिर नन्हें से रोहित को छोड़ कर गर्मी की इस दोपहर में कृष्णा जा कहाँ रही है? घर की बहु बिना किसी सेवक के और छुपकर जा कहाँ रही है ? उसकी चिंता में लम्बे डग भरता शेखर भी छुप कर उसके पीछे हो चला |

लम्बे कदम बढाती कृष्णा जैसे हवा की रफ़्तार से बढ़ी जा रही थी | आज उसके क़दमों को पर लग गए थे| गुस्से की आग में न उसे आगे दिख रहा था ना पीछे| जल्द ही वो वृंदा के घर के सामने थी| दरवाज़ा भिडा था उसने तेजी से उसे खोल दिया और झटके से अंदर घुसी|

वृंदा सामने अपने गीले बाल सूखा रही थी| सन्नाटा सा था, लगता है राधे काका अंदर सो रहे होंगे|

“कैसी कट रही है तुम्हारी वृंदा? बड़े से पलंग की आदत डाल ली थी तुमने, अब छोटे से घर में गुज़ारा हो जाता है तुम्हारा? हवेली के मर्द के अलावा दूसरा भी पसंद आया तुम्हें? तमतमाते हुए पूछ बैठी कृष्णा| गोरा चेहरा जैसे लाल हो उठा |

सामने अपनी प्यारी सखी कृष्णा को सामने पाकर हतप्रभ थी वृंदा| ना जाने कितनी बार उसने इस घडी के लिए सोचा था, उसे हमेशा लगता उसकी सखी उसे कभी गलत नहीं मानेगी| जिस दिन वो उसे इस ना किये पाप से ऋण कर देगी ,उस दिन वो अपने सारे दुःख भूल जाएगी| जल्दी में करवाई गयी शादी, दुहाजू पति… सब कुछ …….. इतनी पीड़ा और तिल-तिल रिसता रिश्तों का यह ज़ख्म ……. सब कुछ!

“सखी….भर्राये गले से बस इतना ही बोल पाई|

“ना बोल मुझे सखी, तुमने वो अधिकार खो दिया, आज तू सिर्फ़ हवेली की बड़ी बहु के सवालों का जवाब दे।” कृष्णा ने कड़े शब्दों में कहा| कृष्णा के चेहरे की इस भाव ने उसे सबसे ज्यादा पीड़ा दी| कैसे उसकी सखी ने उसे ऐसा नीच माना? आहत सी वहीं फर्श पर बैठ गयी|

“मुझे नहीं पता था कि बाकी लोगों की तरह मेरी सखी भी मुझ पर कलंक का एक काला टीका ही लगाएगी| ना जाने कब से तेरी राह देख रही थी, मुझे लगा मेरी कृष्णा मुझे जानती है| मुझे हवेली जाना पसंद है ,वहां की दीवारों को ताकना पसंद है ,उनमें दरार कैसे डाल पाऊँगी मैं? मुझे मेरी कृष्णा और उसके पति की खट्टी-मीठी कहानियां पसंद हैं, मैं कहानी सुन कर खुश हो लेती हूँ, कहानी में त्रिकोण नहीं बनुँगी कभी! मुझे कृष्णा की ज़िंदगी परियों जैसी लगती है, पर मैं इस कहानी में आई कोई दुष्टात्मा नहीं हूँ| क्यों मैं आज अपने सच के साथ इतनी अकेली हूँ? सुन कृष्णा वो जो बेर हमने साथ खाये थे, उन बेरों की कसम, मैंने कोई गलत नहीं किया| वो पतंग मैंने जो तुझे लूट कर दी थी, जिसे हमने तेरी सासु माँ के डर से बक्से में छिपाया था उस पतंग की कसम मैंने कुछ गलत नहीं किया| याद है वो कपड़ों की गुड़िया जिसे हम दोनों ने साथ मिल कर रधिया मौसी की चुन्नी बिटिया के लिए सिली थी, जिसके बाल मैंने बाउजी के स्वेटर के भूरे ऊन के धागों से बनाया था, उसकी कसम मैं तेरी ज़िंदगी में कुछ गलत कर ही नहीं सकती। ..उसके दोनों हथेलियां न जाने कब एक दूसरे को रगड़ने लगी…… पर वो तो अपने उलटे-सीधे उदाहरण देने में ही व्यस्त थी|

कृष्णा को अपने पैरों तले जमीन खिसकती हुई लगी| हमेशा वृंदा की बात जब कृष्णा को सही नहीं लगती और वो उसे नहीं मानती तो उसकी सच्ची वृंदा आवेश में ऐसे न जाने क्या-क्या उदाहरण देना शुरू करती और एक समय वो भी आता जब बाकियों से भी वृंदा के सच की ही पुष्टि होती| हर बार वो कान पकड़कर वृंदा से माफ़ी मांगती| पर इसमें एक दो दिन लग जाते, वो बाकियों से सच का पता करती और जब तक उसे सच का पता चलता तब तक वृंदा ऐसी ही दुहाई देती रहती ,पर कृष्णा जल्दी मानती ही नहीं |

आज तो बात दो दिन से दो साल की हो आयी थी! कैसे मान लिया उसने इमली दाई की बात को पूरा सच? उसे पता है पहले भी उसने कितने दो- पांच किये हैं| वो कितना जलती थी वृंदा से ! कितने तोहफे गटके हैं उसने कृष्णा से! आज उसे कोई तसदीक़ नहीं करनी !

कान पकड़ कर आज फिर कृष्णा वृंदा के सामने खड़ी थी …….. आज कृष्णा और वृंदा के बीच कोई बड़ी सी हवेली नहीं थी ,बस था तो दो सखियों का अनकहा पर मज़बूत रिश्ता |

इतने दिनों का भारीपन दिल से उतरा तो आज कृष्णा के पाँव डगमगा गए | ज़ोर से गिरती अगर शेखर के मज़बूत बाँहों ने अचानक उसे संभाल नहीं लिया होता |

हाथ कानों पर ही थे, अब आँखों के कोर भी गीले हो चले थे| हवेली की बड़ी दीवारों में उपजा अविश्वास आज, इस छोटी सी झोपड़ीं में हमेशा के लिए दम तोड़ रहा था|

   -अमृता श्री

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