बंद दरवाज़े की सीलन

AC की ठंडी हवा में भी उसका गला सूख रहा था | धीरे से नीरव का हाथ अपने शरीर से उठा कर सुहानी पानी पीने उठी तो पाया कि पानी जग में बस थोड़ा सा बचा था | सोचा इसमें कुछ होने वाला नहीं ,बाहर निकल कर पानी भी पी लेती हूँ और जग भी भर कर ले आती हूँ |

नानी के घर में लगे खस के परदे से आती भीनी भीनी गीली हवा की खुशबु ,सुराही का मिटटी की खुशबू लिया पानी और फिर रात को सोने से पहले छत का गीला करना गर्मी का भी मज़ा दिला देता |

साजो सामान से भरा उसका ससुराल उसे उसकी मिटटी से दूर करता ही लगता | उसे ताम झाम से भरा पूरा उसका यह घर कहीं से अपना सा नहीं लगता| पति नीरव ही था जिसकी बाँहों में छिप कर आराम सा आ जाता |

सके इस नए घर में सासु माँ की मौत के बाद नौकरानियों से सुनती हूँ कि बस जेठानी जी का ही राज़ है | उनके नज़र के इशारा बिना एक पत्ता नहीं डोलता यहाँ | मझली दी मंजरी तो जैसे नाम की ही थी | उनके चेहरे की हंसी का खोखलापन साफ़ दीखता | मंझले भैया नवीन जी तो मंजरी दी को एक पैसा नहीं लगाते| कभी कभी बाउजी ही उनकी खोजखबर ले लिया करते | उनकी मनपसंद गाजर का हलवा बनवा देते ,कभी साड़ियाँ ला देते | उनके बेटे बबलू की चॉकलेट हर शाम आ जाती ,बाउजी के कहने पर|

सुनते है ,मंजरी दी उसकी तरह ही छोटे शहर से बियाही है ,घर की थोड़ी कमज़ोर है इसलिए ज्यादातर चुपचाप ही रहती है| उनका स्वाभाव ज्यादा पसंद आया उन्हें ,सो जेठानी रोशनी ने तो बिगुल ही बजा दिया कि छोटे जी की भी शादी छोटे शहर से ही करना है| सासु माँ के जाने के बाद बाउजी ज्यादा कुछ राय नहीं देते ,बोल पड़े बस नीरव को पसंद आनी चाहिए ,और इस घर में भगवान का दिया सब कुछ है| वैसे भी जेठ जी की मृत्यु के बाद ससुर जी जेठानी की बात काटा नहीं करते ,आखिर दुःख कितना बड़ा है अभागन का! ऐसे आ गयी वो इस घर में सबसे छोटी और नीरव की पत्नी बनकर|

स घर में बब्बू की शैतानियाँ ही घर का रौनक बनाये रखती | बब्बू के साथ वो भी खेल लिया करती | मंजरी दी के पास जब भी बैठती,जेठानी का उसके लिए कुछ आदेश आ जाता |चुपचाप सी मंजरी उसे बड़ी हैरान करती ! आखिर क्यों यह चुपचाप रहती है ? उनकी खोयी खोयी आँखों में बस सूनापन ही तैरता मिलता |

भी वो नयी नयी है | जल्द ही मंजरी दी से दोस्ती कर लेगी वो | फिर दोनों जेठानी को सास की तरह ही सम्मान देते रहेंगे | घर -परिवार के कामों में जैसे खुद को भुला बैठी है | शायद सारा घर उनका मान रखता है ताकि वो अपने गम को भूलकर घर के कामों में उलझकर यह पहाड़ जैसी ज़िन्दगी अकेले काटने का कुछ हौसला ही पा लें !

सोफे पर बैठी बैठी क्या क्या सोच गयी वो तो ! पानी पीने बाहर आयी और सोफे पर तो जैसे जम सी गयी वो | बाहर वाले कमरे में रखा मछलियों का एक्वेरियम में रम गयी वो ! बचपन से ही मछलियां उसे बड़ी पसंद आती ,पर तब वो अपने बाबा के साथ, शहर का बड़ा सा एक्वेरियम देख आती थी,कभी -कभी !

हाथ में जग लेकर पानी लेते उठी ही थी कि जेठानी के रूम से धीमी धीमी हंसी की आवाज़ आयी | चौंक सी गयी वो! ज़रा सम्भले कि मंझले भइया नवीन कमरे से बाहर आते दिखें | पैरो तले जमीं खिसक गयी | अच्छा था ,अँधेरे में ही बैठी थी और एक्वेरियम की रोशनी में मछलियों का नज़ारा कर रही थी | सहम सी गयी वो !

क्या वो अपनी आँखों पर विश्वास कर सकती है ? क्या यही है राज़ मंजरी के चेहरे पर मुस्कान के पीछे छुपी बेबसी का ? क्या किसी को इस घर में इसका पता नहीं कि आँखों देखि मक्खी सभी निगले जा रहे है ? क्या वो ज्यादा सोंच रही है ? नवीन भैया किसी और काम से भी तो बड़ी भाभी के कमरे में जा सकतें है | एक उलझन सी घिर आयी |

चुपचाप अँधेरे कमरे में खड़ी सुहानी की जैसे साँसे रेलगाड़ी की रफ़्तार से बढ़ी जा रही थी | प्यास और सदमे में सूखा गला शायद आज पूरी बोतल का पानी पीकर भी शायद ही गीला हो ! पैर जैसे शरीर का वज़न उठाने को न कर रहे थे| धीरे से वो सोफे पर फिर से बैठ गयी |

थोड़ी देर ऐसे ही बेजान बैठी रही फिर बिखरे हुए खुद को समेटा | खुद को समझाया कि आँखों देखि पर विश्वास नहीं करेगी और न ही अपनी आँखों को बंद ही रखेगी | वो सच्चाई का पता लगाकर रहेगी| अगर कहीं बंद दरवाज़े के राज़ घर की नींव हिला रहें हो तो वो ऐसा होने नहीं देगी | इस बार उसके कदम थोड़ी मज़बूती से उठे | पानी पीकर नीरव के पास लेटी तो वो भी आज अजनबी सा ही लगा ! क्या हो गया है उसे ?बेचैनियों में कब खिड़की से सूरज सामने आया कब उसकी पीली किरणों ने उसके कमरे में कब्ज़ा जमा लिया ,उसका अहसास ही नहीं हो पाया उसे !करवटों में ही गुज़र गयी रात सारी !

रसोई में चाय की प्यालियों की खनक ने और काम वालियों की गुटरगूँ से घर कुछ अच्छा लगने लगा |

“छोटी बहु कहाँ चाय भिजवाऊं ,बैठक में या कमरे में पीयेंगे आप दोनों ” साडी का पल्लू दांतों में दाबे रमिया को सपाट सा जवाब दिया “बैठक में ही लगा दो काकी” और छोटे बाबू को वही आने की आवाज़ लगा देना ,कहती हुई बैठक की और बढ़ गयी | वैसे तो सुबह की चाय सभी बैठक में ही पीते थे पर नयी नवेली थी वो और पति के साथ चाय की चुस्कियां अकेले में लेने का आनंद लेने से खुद को रोक नहीं पाती तो कमरे में ही चाय पिया करती | नीरव को भी यह नज़दीकियां रास आती थी |

सुहानी को वहां देख सभी चौंक गए पर बब्बू की तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा |

दूध में बिस्किट आराम से डूबा कर खाये जा रहा था ,छोटी चाची को देख मचलने लगा |” मुझे खिला दो न चाची “मचलने लगा |

मंजरी ने खिलाने को कहा तो रूठ कर बैठ गया | सुहानी ने फिर लाड से उसे गोद में बिठाया और बिस्किट को कभी बाघ बोलती कभी खरगोश और वो मज़े मज़े में खाये जाता | उसे पता था माँ ज्यादा बात नहीं करेगी सबके सामने इसलिए छोटी चाची के आने से तो बैठक में बस मज़ा आ गया उसके लिए |

“बब्बू छोड़ अपनी चाची को, चाचा के पास आ ,देख क्या जादू दिखाता हूँ तुझे ” नीरव की बात सुनकर झट से पार्टी बदल दी उसने !

मंजरी को और ससुर जी सुहानी का बैठक में आना बहुत अच्छा लगा ,किसी ने कुछ बोला तो नहीं पर उनके चेहरे ने सारी चुगली कर दी ,जैसे नवीन भैया और जेठानी जी को उसका आना अटपटा लगा,वो भी ज़ाहिर हो गया |

बिस्किट और मिक्सचर नवीन के प्लेट में डालते हुए ,कैसे जेठानी जी और नवीन भैया की उँगलियों ने सबसे छुपकर बद्तमीज़ियां की तो इस बार उसने भी देखा और उसका देखना उसकी जेठानी ने भी देखा |

थोड़ी सकपका गयी वो कुछ समय के लिए ,फिर ढीठ बनकर पौधों का जायज़ा लेने लगी | कुल मिला जुलाकर सुहानी के आने से बैठक की यह महफ़िल ज्यादा देर न चल पाई | पर उसे तो जानना था ,उसे पुख्ता करने में, सुहानी को ज्यादा वक़्त नहीं लगा |

सुबह के नाश्ते के बाद जब जब नवीन भैया और नीरव खेत देखने निकल गए और बाउजी अपने कमरे में लेट गए तो वो भी अपने कमरे में आ गयी |अभी थोड़ा कमर सीधा ही किया था कि जेठानी जी की मुहलगी नौकरानी कमली ने दरवाज़े पर दस्तक देकर कहा “बड़की मलकिनी ने आपको तुरंत बुलाया है”|

वो भी उनसे सामने सामने बात करना चाहती थी तो उसने भी देर नहीं की |

“आओ छोटी आओ ,सोंचा कुछ दिन हो गए तेरे ब्याह को तो सोंचा कुछ ऊंच नीच सीखा दें घर के | आखिर बन तो गयी हो अब इस घर का हिस्सा तुम | अब तो घर के तौर तरीका सीखा दूँ | कहाँ तुम्हे मुँह खोलना है कहाँ नहीं, आज सीखा दूँ तुम्हे ! और क्या देखना है क्या नहीं वो भी ,व्यंग्य से मुस्कुरा उठी जेठानी “सही बोल रही हूँ हलके में मत ले लेना जी ” अगर ठीक से रही तो ठीक नहीं तो मिनट नहीं लगेगा तुम्हे घर से बाहर फिंकवाने में ,देख रही हो न मंजरी को कैसे शांति से ज़ी रही है ,उसके बाप के खेत हमारे पास गिरवी है और तुम्हे पता होगा घर तुम्हारा भी हमारे पास गिरवी है ” कहते हुए आवाज़ में एक ठंडापन सा आ गया ” |

किसी के भी रीढ़ की हड्डी में सिहरन आ जाये पर यह सुहानी थी जिसने अपनी माँ की बीमारी के सामने हार नहीं मानी ,अपनी पढाई चलाने के लिए अपनी गरीबी से हार नहीं मानी फिर उसे आज भी डर क्यों लगता ?

हंस के बोल पड़ी ” दीदी मुझे क्या लेना देना किसी से ,बस आप अपनी बनाकर रखोगे तो इससे बड़ी क्या बात होगी हमारे लिए ? इतनी अक्ल तो हमारे पास भी है भगवान की दया से ” फिक से हंस पड़ी वो !

उसके इतना कहते ही कमरे का तनाव कहीं छू सा हो गया | तनाव रहित होते ही भाभी ने ज़ोर का ठहाका लगाया | बिना बात क्या क्या सोंच बैठी वो , यह तो मंजरी की तरह मेमना ही निकली ” अपनी ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी अब तो !अरे कमली ज़रा चाय तो पिला अदरक वाली ” वो अपनी पान की तैयारी में जुट गयी |

इस बीच एक दिन अपने पति नीरव से पूछी पूछ बैठी वो ” क्या जी तुम्हें नहीं लगता घर में सब ठीक नहीं !

“फालतू के दिमाग के घोड़े न दौड़ाया करो ,अपने फाइनल एग्जाम में कंसन्ट्रेट कर लो वही काम आएगा ” नीरव की यह बातें और उसके बाद भी उसकी घर के खिलाफ कुछ न सुनने की मनोदशा ,देखकर उसे पता लग गया था कि नीरव उसका साथ नहीं देगा |

कच्ची खिलाडी नहीं थी उसकी जेठानी भी | तराज़ू के हर बाट पे नापा परखा उसे ,कुछ तीन महीने ,जब पूरी तरह निश्चिन्त हुई वो सुहानी से ,फिर पक्की दोस्ती होने में ज्यादा देर न लगी |

“भाभी एक बात तो बताओ आखिर क्या देखा आपने नवीन भैया में ,आपके सामने तो कोई जोड़ नहीं उनका ” हंस के पूछ बैठी सुहानी| एक पल देखा उसे, पर विश्वास की डोर इस बार पक्की थी और कुछ कल रात का खुमार भी था बोल पड़ी रोशनी दिल की बात ” अरे क्या नवीन ,क्या नीरव मुझे दोनों नहीं चाहिए थे ,पर नीरज (उनके पति ) के मौत के बाद लगा घर पर कब्ज़ा और मिलकियत बनाये रखनी हो तो किसी बेटे को कब्ज़ा में करना ही होगा | आसानी से नवीन झांसे में आ गया| मुर्ख है ,जो बोलती हूँ सुनता है ,करता है | नवीन की बीबी मंजरी की ज़रूरतों का इस घर में ख्याल रख ही लिया जाता है | सच कहो तो जब कहीं राज कायम किये जाते है तो किसी न किसी को पीसना तो पड़ता ही है | फिलॉसफिकल हो चली जेठानी | कुछ देर के लिए चुप हो गयी |

उन्हें भी पता था जो हो रहा था सही नहीं हो रहा था | चाहे व्यक्ति जितना भी पाप कर ले ,कभी न कभी उसपर ग्लानि के क्षण हावी हो जातें है ,यह लम्हा कुछ ऐसा ही था | ऐसी ही हालत में बस उनका कन्धा छूकर , अपने कमरे लौट आयी सुहानी !

कमरे का दरवाज़ा बंद करके सबसे पहले मोबाइल की रिकॉर्डिंग चेक की ,सब सही से रिकॉर्ड हुआ या नहीं ?उसे भी पता था ग्लानि के ये क्षण क्षणिक है,यह पानी जल्दी उतर जायेगा | हेड फ़ोन लगाकर सुना तो आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए |

जेठानी खेत का काम देखने नवीन भैया के साथ बाहर निकली थी ,उनकी मुँहलगी दासी कमली छुट्टी पर और नीरव आज बीज लाने शहर ,यह सही मौका था ,ससुर जी से बात करने का |

“बाउजी ,क्या मैं अंदर आ जाऊं ? ,बाउजी ने फ़ौरन उसे बुलाया ” हाँ बहु कहो क्या बात है ” ससुर जी ने पूछा ,वैसे उनकी आवाज़ में वैसे पहले वाली खनक नहीं थी ” | इस बार सीधे- सीधे वही सवाल पूछा, जो नीरव से पूछा था ” क्या आपको लगता है इस घर में सब ठीक ठाक है ? बाउजी ने गहरी निगाह से उसे देखकर एक आह सी आवाज़ निकाली ” अगर सब चुप है तो मैं भी ! अकेला क्या कर सकता हूँ मैं ?सब इस खेल का हिस्सा बने है तो मैं अकेला क्या कर सकता हूँ ,बाहर वाले को शामिल करूँ तो भद्द मेरे घर की उड़ती है | ” बोलो क्या कहना है तुम्हे भी ? कुछ दिनों से तुम्हें भी देख रहा हूँ मैं! एक गहरी निश्वास सी आयी |

“नहीं बाउजी कभी खेल का हिस्सा बनकर ही खेल के दांव -पेंच सीखे जा सकते हैं ,मैं वही कर रही थी ” सुहानी ने सर झुका कर जवाब दिया|

अविश्वास से उसका चेहरा तकते बूढ़े श्वसुर को पहले तो विश्वास नहीं हुआ ,फिर आँखों से आंसूं निकलने लगे ” तुझे पता है तेरा महिला अधिकार के भाषण, तुझे दुर्गा पूजा पांडाल में जब करते देखा, तभी से तुझे ही चुना मैंने अपने नीरव के लिए | ईश्वर का शुक्र है कि मैं मुख्य अतिथि था | लगा तुझमे एक आग है | मेरे घर में चल रहे पाप का अंत करेगी तू | दुर्गा है दुर्गा !फिर सबने जो देखा वो तेरी टूटी हुई छत देखी ,तेरी बीमार माँ देखी और देखा कि तेरा घर हमारे यहाँ गिरवी है ,पर तेरे अंदर की आग सिर्फ मैंने देखी | तू मेरा घर की सीलन दूर करेगी न बहु ,मेरी लक्ष्मी ,मेरी दुर्गा ” इतने दिनों से अन्तर्द्वन्द से जूझते श्यामाप्रसाद के तो आंसू रुक पा रहे थे न भावनाओं पर लगाम लग रही थी |

हर दुःख सुख बतियाने वाली साथी चली गयी थी ,बेटे उन्हें किनारा कर रहे थे, ऐसे में सुहानी का साथ पाकर, अपने टूटते हुए घर को फिर से जोड़ने की भावना जाग पड़ी उनमे | फिर दोनों ने एक प्लान बनाया |

सुबह बैठक में चाय पीते समय बाउजी बोल पड़े ” अरे बड़की बहु ,तुम भाई के शादी में जाने का बात कर रही थी न ,होकर आ जाओ ,यहाँ के पचड़े खतम नहीं होनेवाले “फिर यहाँ मंजरी सुहानी देख लेंगी घर को ,4 दिन की तो बात है ” बड़े दिन के बाद बाउजी की आवाज़ बैठक में गुंजी |

” जी बाउजी ,तब नवीन जी को कहिये हमे छोड़ आये और ले भी आये “जेठानी जी ने तपाक से पूछ लिया |

“नहीं बहु इस बार नवीन को हम अपने अकॉउंटेंट से मिलाने की बात सोंचे है ,नीरव शहर जा रहा है अपने दोस्त की शादी में और इ आजकल का जोड़ -घटाव ज्यादा समझ नहीं आता हमको | मुंशी जी जाकर छोड़ आयेंगें और वापसी का बता देना ,नवीन को भेज दूंगा तभी के तभी, तुम्हे लेकर आ जायेगा| ” बाउजी के इस फैसले से जेठानी जी और नवीन भैया दोनों के चेहरे उतर गए |

मरता क्या न करता ? तड़के जेठानी घर के लिए विदा हुईं | कमली बाई को भी खेतो पर काम करने शिफ्ट किया | बाउजी ऐसा करते रहते थे ,कमली को ठीक ही लगा ,मलकिनी भी नहीं है ,बाकि बाई इतनी जलनखोर है ,अच्छा है वो खेतों पर ही काम करें |

आज नवीन अकेला ही था बैठक में ,मन ही नहीं लग रह था उसका | बब्बू ने उसे बताया बाउजी कमरे में बुला रहे है ,निर्जीव चाल से चल पड़ा वो |

” बाउजी” बाहर से ही अनुमति लिया तो बाउजी ने कहा ” अंदर आ जाओ ” | अंदर गया तो पाया नीरव ,उसकी बहु ,उसकी पत्नी सब अंदर ही बैठे थे ,सबके चेहरे भी खींचे खींचे से थे | बाउजी बिना किसी लग लपेट के बोल पड़े ” नवीन क्या चल रहा है ,हम सब जानते है और तुम भी | कब तक चलेगा इसका जवाब सिर्फ तुम दे सकते हो ” |

” मैं समझा नहीं “बाउजी की धीर गंभीर आवाज़ से सहम गया नवीन |

बदले में बाउजी ने रिकॉर्डिंग चला दी | आधी में ही अपने मुँह में कपड़ा ठूंस कर मंजरी रोती हुई बाहर चली गयी |

रिकॉर्डिंग के बाद बस अब बाउजी की आवाज़ ही गूंज रही थी ” देखो बेटा तुम बड़े हो और समझदार भी | स्थिति किसी से छिपी नहीं | पर हाँ अब इस गंदे खेल को अब मैं इस घर में और नहीं चलने दूंगा | सम्पति मेरी अर्जित की हुई है ,तुम्हारी बुद्धि अगर फिर भी भर्मित रही तो मैं तुम्हे इसमें से बेदखल कर दूंगा ,बब्बू हकदार होगा और जब तक वो बालिग नहीं होगा तबतक मंजरी उसकी गार्जियन रहेगी| एक नयी विल ही तो बनानी होगी मुझे !कर लूंगा वो भी! ” सोंच कर अपना फैसला ज़रूर सुना देना, दो दिन में जबतक बड़ी बहु रोशनी भी आ जाएगी ,दोनों एक साथ ही घर से निकल लेना ” | सर झुकाये नवीन कमरे से बाहर आ गया |

दो दिनों तक खामोश अपने कमरे में पड़ा रहा | पत्नी थी मंजरी घबरा गयी | पहले ही ठीक था नवीन ,कम से कम उसे खुश तो देखती थी ,बब्बू भी उसके साथ समय बिता लेता था ,उसका क्या ? वो तो ऐसे ही समझौता तो कर ही चुकी थी | शाम तक उसके धैर्य का बांध टूट गया|

कितने दिनों बाद आज वो अपने पिया से बात कर रही थी बिना किसी रुकाव के ” सुनिए जी ,मुझे आपकी सम्पति से क्या लेना देना ? मैं बब्बू के साथ ही चली जाउंगी ,आप कर लेना अपनी ज़िंदगी की नयी शुरुआत | बाउजी की वो कपडे की दुकान जो बंद पड़ी है बस वो दिलवा दे मुझे ,छोटी दुकान है पर हम माँ -बेटे का पेट भर देगी | मैं फिर न आउंगी आपके ज़िंदगी में झाँकने ,बस आप खुश रहें ” एक साँस में कह गयी वो |

चुपचाप देखता रहा वो फिर उसके दोनों हाथों में अपने सर लगा कर ,छोटे बच्चे की तरह फफक कर रो पड़ा वो !

“क्या किये जा रहा था मैं ?कीचड में जैसे धंसता ही जा रहा था | तुमने मेरी जगह यह किया होता तो शायद मैं भी माफ़ करने में सोंचता ,पर तुमसे विनती करता हूँ कि माफ़ कर दो मुझे ,हम यहाँ नहीं रहेंगे ,कहीं और अपना घर फिर से बसायेंगे ,क्या साथ दोगी तुम मेरा इस बार भी ? क्या माफ़ कर पाओगी तुम मुझे ? एक सांस में सारे सवाल पूछ गया वो ,जैसे न में किया उसका जवाब उसकी हस्ती मिटा देगा |

पहले से ही भावनाओं की लहर से घिरी मंजरी ,हाँ हाँ ,बोलते हुए अपनी पिया के बाँहों में समा गयी | आह !इन बारिश की बूंदों ने तपते रेत को शीतल कर दिया हो जैसे !पाओं के फफोले पर बर्फ फिरा दी हो किसी ने जैसे !

दूर खड़े बब्बू को माँ बाबा की नयी नयी दोस्ती बड़ी भा रही थी | उसके ज़ोर-ज़ोर से हंसने की आवाज़ से चौंक के अलग हो गए दोनों और इस बार उनकी बाँहों के घेरे में बब्बू भी था |

नवीन ने बाउजी से कहा कि वो अपने जीवन की शुरुआत नए जगह से और जल्द से जल्द करना चाहता है ,और वो उसे ऊटी के कॉफी प्लांट में काम करने की इज़ाज़त दे दें वैसे भी वो सही आदमी की कमी में घाटे में चल रही है | बाउजी इस उम्र में बच्चों से दूर नहीं रहना चाहते पर समय के तकाजे को भी नकार नहीं सकते थे | बब्बू की जब याद आएगी तो वो उनसे मिलने चले जाया करेंगें ,भारी मन से नवीन को इज़ाज़त दे दी |

कल ही जाना तय हुआ | कल भाभी अपने मायके से आने वाली थी और नवीन उनसे मिले बिना जाना चाहता था | पर ऐसा हो नहीं पाया , गाड़ी पेट्रोल भराने गयी हुई थी कि ऐसे में भाभी का तांगा दरवाज़े रुका |

सामने नवीन को देख उलझ पड़ी बड़ी बहु ” क्या नवीन कितना फ़ोन किया ,कोई मैसेज नहीं ,कोई कॉल नहीं ,भूल गए क्या अपनी भाभी को एकदम से?

नवीन ने कहा “नहीं भाभी बस ध्यान ज़रा देर से आया कि आप भाभी है ,और ऐसे ही याद रखेंगे आपको | आशीर्वाद दीजिये अपनी पत्नी के साथ खुश खुश ज़िंदगी गुज़ार लूँ | ” हाथ जोड़ लिए उसने |

“मंजू गाड़ी आ गयी है ,निकल चलो, नहीं तो शहर टाइम पर नहीं पहुँच पाएंगे ,कल वहां से ट्रेन भी है”मंजरी को बोल पड़ा वो |

बाबूजी का पांव छूती ,सुहानी ,नीरव को लाखों आशीर्वाद देती मंजरी, बबलू का हाथ कस कर पकडे बाहर आयी तो हक्की बक्की जेठानी को देख कर पहली बार उसका गुबार बाहर निकला ” देख लीजिये जीजी आपके देवर को साथ लिए जा रहें है ,फेरों का बंधन सबसे मज़बूत होता है और इससे मज़बूत होतें है वो वादे ,जो साथ लेंतें है | ” पैर छूने का मन नहीं किया हाथ जोड़ कर निकल गयी वो अपने पिया के साथ | दूर होती उसकी पायल की खनक धीमी पड़ती जा रही थी | गाड़ी एक बड़े से हॉर्न की आवाज़ के साथ आगे चल पड़ी थी |

“सामान अपने कमरे में रखकर मेरे कमरे में आना बहु “बाउजी ने अपनी गीली आंखे पोछते हुए उसे कहा |

बंद गले से घरघराते हुए आवाज़ आयी “जी बाउजी ” |

घबराते हुए बाउजी के कमरे में कदम रखा तो बाउजी आराम कुर्सी पर बैठे कुछ सोंच रहे थे | ” जी बाउजी ” धीमी सी आवाज़ निकल कर कहा |

“देख बहु ,न दुराव न छिपाव ,यह इतने दिनों से इस घर में, मेरे आँखों के सामने, जो खेल चल रहा था ना ,उसे बंद कर दिया है मैंने | इन दोनों की बहुओं की तरह ,तुझे भी, कोई बहुत बड़े घर से ब्याह कर नहीं लाया मैं ,तेरे भाई की नौकरी मेरी लगवाई हुई है और तेरे बाउजी ने जो 4 लाख का कर्ज़ा मुझसे लिया था वो कागज़ात भी मेरे पास धरे पड़े हैं | मैंने तो यही सोचा कि इस घर में कोई चीज़ की कमी नहीं ,तुम तीनों ख़ुशी ख़ुशी रह लोगे | पर तेरे सर पर चढ़ गया मिलकियत का भूत!नीरज भी छोड़ चला गया और उसकी माँ भी ,आज भी वो एक्सीडेंट को भूल नहीं पाता मैं ! खामोश रह गया मैं और मेरी ख़ामोशी को मेरी कमज़ोरी समझ बैठी तू !तुझे घर बहु बनाकर लाया मैं !तेरी शादी को चार साल हुए डॉक्टर ने बताया कि माँ नहीं बन सकती तू ,तुझे कभी नहीं कोसा न नीरज की माँ ने ऐसा किया ,सोंचा जॉइंट फॅमिली है ,नवीन ,नीरव के बच्चे पाल ,तू भी माँ का सुख भोग लेगी| तुझे नीरज की माँ के विरुद्ध जाकर मैंने बच्चा गोद लेने की सलाह दी ,पर तुम दोनों बोले ,बब्बू ही हमारा बेटा है | नीरज और उसकी माँ के जाने के बाद तूने क्या क्या दिन मुझे नहीं दिखाए,मैं चुप रहा ,कुछ सदमे से ,कुछ शर्म से !बस अब और नहीं |

तुझे बता दूँ बहुत पहले सम्पति का विल बना चूका हूँ मैं ,जिसमे तुम तीनो बराबर के हिस्सेदार हो न कोई बड़ा न कोई छोटा | अब तेरे ऊपर मेरी नज़र है ,ज़रा सी इधर उधर करते देखा तुम्हें ,बस तेरे घर पहुंचा कर ही आऊंगा तुझे ,तेरे काले चिट्ठे तेरे घर में खोलकर ही आऊंगा ,वरना अब संभल जा तू |

बड़ी बहु को अपना भविष्य साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था | सर झुककर बाहर निकल आयी वो !आज इस घर को इसका सही मालिक मिल गया था !

रात के सरसराते अँधेरे में नीरव ने सुहानी को अपनी बाँहों में लेकर उसकी कानो में धीरे से पूछा ” ज़रा अपने पैर तो दिखाओ ,मुड़े तो नहीं है न ? कोई जादूगरनी ही लगती हो तुम !

मंदिर की घंटी से खनखनाहट अपनी हंसी में लिए बोल पड़ी वो ” आज पता लगा महाशय को !”ज़रा करीब तो आना ,तुम्हारे कान भी देखने है ” खिलखिलाती हुई सुहानी बिस्तर के दूसरे कोने में सरकने लगी |

सुबह के सूरज की तप्त किरणे बंद दरवाज़े की सीलन सूखा चुकी थी | बाहर सूरज पूरी प्रखरता से चमक रहा था |

–अमृता श्री 

man and woman facing each other
Photo by 🇮🇳Amol Nandiwadekar on Pexels.com

 

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