शज़र की बात करती हो?

शाखें निकली नहीं अभी तक ,शज़र की बात करती हो?
शामें ढली  नहीं अभी तक ,सहर की बात करती हो ?

 

इस राह से जाओ ,यह जानी पहचानी है  ,
और तुम हो कि अनजान गलियों की बात करती हो ?

 

कहती हो कि लोग समझ जायेंगे तुम्हारी तकरीरों को ,

किस दौर में रहती हो तुम, किस ज़माने की बात करती हो ?

 

अंदाज़ेबयां तुम्हारा सबसे हटकर है “श्री ” क्योंकर ,
बुत बन गए इंसानों को क्यों जगाने की बात करती हो ?

Written by -अमृता श्री 

snowy pathway surrounded by bare tree
Photo by freestocks.org on Pexels.com

 

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