कुमुद

” सुनो जी” अम्मा ने धीमे से बाबा के पास जाकर कहा |

“हाँ अब तुम भी अपने विचार रख ही लो ,मैं एक अकेला हूँ न सबकी बातें झेलने के लिए” बाबा ने चिढ कर कहा |

अम्मा जानती थी जब सारी बातें मन की नहीं हो पाती तो वो चिढ़ जातें है ,शायद अंदर ही अंदर कोई बात उन्हें भी खटक रही थी |

पर जब माँ खुद पर आती है तो वो सोंचती नहीं  सुनो जी ,भले ही कुमुद हमारी कद में छोटी रह गयी हो ,पर राजकुमारी की तरह पाला है हमने ,अब कैसे किसी गरीब घर ब्याह दे अपनी लाडो को ? बाबा ने अपनी खीझ पर काबू कर के बोला, थोड़ा समझो ,लड़की को ऐसे ही किसीके गले नहीं बांध रहा | अच्छा परिवार है ,हाँ यह सही है कि अभी कुछ पैसे की कमी है वहां ,लड़के पर जिम्मेदारी अपने घर की ज्यादा है ,तो हम मदद कर देंगें ना उसे | लड़के के बारे में पता किया है ,लड़के में कोई ऐब नहीं | सरकारी नौकरी है और अपनी कुमुद के सामने राजकुमार ही लगता है |

माँ ने आराम की साँस ली ,पति की बातों से एक सुकून सा मिला कि बच्ची के बारे में वो भी फिक्रमंद है |

“कुमुद “जैसा नाम वैसा चेहरा ! काली बड़ी आंखे ,लम्बे बाल ,पतली छरहरी सी शैतान कुमुद ,अपने बाबा ,अम्मा की लाड़ली | उसके चेहरे पर एक काला सा तिल जैसे उसके हुस्न की रखवाली करने को तत्पर सिपाही सा! सब कुछ दिया दिया था ईश्वर ने बस लम्बाई देना भूल गए ,यह जैसे दुनियावालों के लिए बड़ा सा गुनाह हो गया |

अपनी हवेली की महफूज़ दीवारों के बीच बढ़ती कुमुद को जीवन की हर खुशियां हासिल थी|मुँह खोले बिना सब कुछ उसे मिल जाता|दास ,दासियों की फ़ौज उसके भाई बहनो की तरह अपनी इस लाड़ली बिटिया के भी सारी ज़रूरतों का ख्याल रखते|

45 कमरों की यह हवेली जिसमे दो आंगन और दो बैठके थी ,दो मंदिर,उसके लिए एक भूलभुलैया सा था | लुका छिपी में जैसे कभी गुम हो जाती कुमुद ! इतने बड़े घर में प्रवेश के लिए एक बड़ा दरवाज़ा था जिसे बड़ा फाटक बोलतें थे | सीढ़ियां बैठक की तरफ जाती जहाँ बैठने के लिए गद्दे भी थें और भारी भारी कुर्सियाँ! गद्दों के पास रखा बड़ा सा चांदी का हुक्का बड़ी सी पाइप वाला.कितनी बार नज़र बचाकर मुँह से ज़ोर जोर से खींचा है ,कुछ आता जाता तो नहीं तो यह बड़े बड़े लोग बड़ी बड़ी बातें करते इसे मुँह से लगाते भी क्यों है ? उनके मुँह से तो इत्ता धुआं निकलता है मेरे मुँह से क्यों नहीं ,सोंच ही रही थी कि दादी की बड़ी सी धप्प पड़ी पीठ पर|

“लाडो दुबारा ऐसा करते देखा तो तेरी खैर नहीं !” दादी की आँखों में अपना भविष्य दिख गया फिर उसकी क्या मज़ाल कि वो ऐसा करने की ज़ुर्रत भी करे!

दादी आज भी अपने शादी में मिले अपने बाउजी से मिले गांवों के लोगों से मिलती जुलती है | जमींदारी नहीं रही पर न उन्होंने अपने गांव वालों को छोड़ा न ही गांव वालों ने उन्हें !उनकी रुतबे में कोई कमी नहीं | दादा के खड़ाऊं की पूजा करती दादी ,गाय को खिलाकर ही अन्न का दाना डालती उसकी दादी ,सब कुछ कुमुद को अब भी याद है!

उसका सीमेंट से बना घरौंदा जिसमे खिड़कियां दरवाज़े भी लगे थे जो खुलते और बंद होते थे ,उसके स्कूल की सखियों के लिए जलन के विषय थे | बड़े फाटक से अंदर आता लम्बा सा गलियारा फिर कभी न खत्म होने वाली सीढ़ियां !दो बड़े पत्थर थे कहते है दादा के समय हाथी बांधे जाते थे | फिर बड़ा सा फलों का बागान और वही एक कुआँ और शिव जी का मंदिर ,सब कुछ………….. एक पुरानी पीढ़ी की धरोहर संभालता वक़्त !

कुमुद पैदा भी अजीब समय पर हुई थी ,जमींदारी रही नहीं ,रुतबा गया नहीं ! बेटे के मोह में चार बेटियां हुई ,बेटा हुआ पर इस दौरान बड़ी कुमुद कद में छोटी रह गयी | बाबा को रिश्ते के लिए कोई ना करे ,गवारा नहीं था ,और बाकि बेटियां ताड की तरह बढ़ी जा रही थी|कमाने के पुराने स्रोत बंद हो रहे थे और नाम के लिए जब कुमुद के बाबा लन्दन बैरिस्टरी पढ़ने गए वो तो सिर्फ अपने बराबर वालों को सुनाने वाली जैसी बात थी कि अगर आपका बेटा यह कर रहा है तो हमारा बेटा भी यह कर रहा है ,वाकई मुश्किल दिनों में यही पढ़ाई काम आयी ,जब जमींदारी गयी तो जिम्मेदारी बढ़ी |किस्मत अच्छी थी और तीव्र बुद्धि रमेश बाबू के काम आयी पर उन्हें पता था अभी और समय लगेगा उन्हें अपनी आर्थिक हालत बहुत अच्छी से और अच्छी करने में और तब तक वो अपनी बेटियों को जिन्हें राजकुमारी सा सहेजा है उनकी शादी नहीं रोक सकते | बीच में आ रहा थी कुमुद का कद !परिवार का ठसक कायम था ,रमेश बाबू को बाकि जमींदारों की तरह शराब की आदत नहीं थी ,पैसो की भी कमी नहीं थी ,और उसने खुद से पैसे बनाने भी सीख लिए थे तो घर की लड़कियों के लिए रिश्ते भी आने लगे थे ,कुमुद को छोड़ सबके रिश्ते मिलने लगे थे |

ऐसे में आया गोपाल का रिश्ता ,मेडिकल डॉक्टर और अभी अभी जॉब में लगा हुआ लड़का | अच्छा ऊँचा कद ,मधुर व्यक्तिव्य का धनी लड़का ,अच्छे खानदान से था | बहुत प्रॉपर्टी थी पर पिता के बीमार और लकवा ग्रस्त हो जाने से चचेरे भाईयों ने उनपर कब्ज़ा करने में देर नहीं लगाया था | माँ ने अपनी सहेजी रकम से उसकी पढ़ाई पूरी करवाई और उसने ली अपने भाईयों की जिम्मेदारी खुद पर ! जब दूसरा भाई अच्छी नौकरी पर लगा तब ही शादी करने की करने के लिए हाँ बोला उसने !

जब उसकी मासी उसके रिश्ते की बात लेकर कुमुद के लिए आयी तो उनकी बातों से प्रभावित होकर बाबा ने हाँ कर दी | लड़का स्वाभाव का हीरा था और रही पैसों की बात तो उन्हें कुमुद को त्यागना थोड़े ही था ? वो थे न अपनी कुमुद का घर संभालने को ,रुपयों के सामने व्यक्ति को मान दिया बाबा ने !हां कर दी बाबा ने पर माँ को कुमुद की चिंता सताये जा रही थी |

पर जब माँ खुद पर आती है तो वो सोचतीं नहीं ” सुनो जी ,भले ही कुमुद हमारी कद में छोटी रह गयी हो ,पर राजकुमारी की तरह पाला है हमने ,अब कैसे किसी गरीब घर ब्याह दे अपनी लाडो को ? माँ के सवालों का ज़वाब बाबा ने बड़ी आसानी से दे दिया क्योकि उनकी आंखे लड़के को परख चुकी थी |

बड़े ताम झाम से ब्याह हुआ कुमुद का | लड़के की कोई मांग नहीं थी पर बाबा ने समानों से लदी चार गाड़ियां खड़ी कर रखीं थी | विदाई के समय हाथ में जब रुपयों की गड्डी दी गयी तो गोपाल ने उनसे और 51 रूपये की मांग की | हँसते हुए बाबा ने 51 रूपये अपने नए जवांई के हाथ में रख दिए|

” बाबा आज से कुमुद मेरी जिम्मेदारी है | मैं जानता हूँ कि कुमुद आपकी सबसे पहली संतान है ,आपके कई ख्वाब होंगे इससे जुड़े हुए ,इसलिए आपसे मैंने यह इक्कावन रूपये (51 ) लिए और हाँ चार साड़ियां भी ले रहा हूँ ,अब से यह मेरी अर्धागिनी है ,इसे मेरी ज़िंदगी जीनी है | मैं आपसे वादा करता हूँ कि अपनी हैसियत में इसे हर सुविधा देने की कोशिश करूँगा मैं ,आप निश्चिन्त रहे | गहने अपने बड़े प्यार से दिए है ,वो इनके पास ही रहेंगे | मुझे आशीर्वाद दें कि मैं आपकी बेटी को वही सुख सुविधा एक दिन दे सकूँ जो आपने इसे दी है ” हाथ जोड़कर गोपाल ने जब ये शब्द रमेश बाबू से कहे तो उन्हें जमीन घूमती नज़र आयी | उनके लिए गोपाल की बातों का मर्म समझना कठिन नहीं था | लड़खड़ा से गए | हाय मेरी लाडो !

चार साड़ियों और 51 रूपये के साथ विदा हो गयी कुमुद अपने नए पिया और अपनी नयी ज़िंदगी की तरफ !पिया के साथ ब्याह के चादर में बंधी गांठ ने कुमद को अपने नए घर पहुंचा दिया | 4 कमरों का ससुर जी का बनाया यह मकान अब मरम्मत की खोज में था | शादी के लिए कराई गयी पेंटिंग में दीवारों की दरारें छुप नहीं पाई थी | गोपाल की अम्मा कहीं से इस रिश्ते से खुश नहीं थी पर रिश्ता उनकी अपनी सगी बहन ने लाया था और उन्हें लगा था बड़े घर का सहारा मिलेगा तो उनके दिन भी फिरेंगे पर दिन क्या फिरेंगे? इस लड़की के क़दमों ने मेरे बेटे का दिमाग ही फिरा दिया था | पहले ही बोला था गोपाल ने कि उसे कुछ नहीं चाहिए तो उन्हें लगा घर की हालात जानते हुए वो ऐसा कभी नहीं करेगा ,झिड़का भी ” साधुवाद यहाँ ना फैला ” पर वहां से गोपाल चुपचाप निकल आया |

चलो इसका दिमाग ही फिरा है ,कम से कम हवेली वालों को भी ज़िद करनी चाहिए थी ,सुना था कई गाड़ियां सामान की खड़ी थी ,कम से कम जबरदस्ती ही भिजवा देते ,हमारी समाज में इज़्ज़त ही रह जाती ,कुछ नहीं मिला और मिल गयी एक छोटे कद की लड़की ,हमारे लल्ला के सामने क्या ज़रा भी ठहरती है ?

बहन को और बेटे को तो कुछ बोल नहीं सकती थी तो गुस्से की ज्वाला फूटी बेचारी कोमल कुमुद पर !

कमरा खूबसूरत फूलों से बेतरतीबी से सजा था आखिर देवरों ने अपनी कल्पना के अनुसार इसे सजाया था | पानी का जग और ग्लास एक टेबल पर ढांक कर रखे थे सब कुछ नया नया सा था | पर हमेशा गोपाल की नज़रें कुमुद को आश्वस्त करती रहती ……. एक अनकहे …….. मैं हूँ ना …… के शब्दों के साथ !

रात की ख़ामोशी में दो दिल कितनी अनकही बातें नज़रों से कह रहे थे | कुमुद के घूँघट को उठाते हुए गोपाल ने उससे कहा ” तुमने मेरी ज़िंदगी में आकर मुझे जीने का एक नया अर्थ दिया है ,मैं अपनी ज़िंदगी में तुम्हारा स्वागत करता हूँ | आज से जो कुछ भी अच्छा या बुरा है ,सब हमारा है | मैं कोशिश करूँगा कि कभी तुम्हारी इन आँखों में किसी आंसू की कोई जगह ना हो | मैं जानता हूँ कि मेरे साथ तुम्हारी राहें थोड़ी कठिन होगी ,मुश्किल भी ,पर वादा करता हूँ तुमसे मैं इसे आसान बनाने की पुरी कोशिश करूँगा | साथ दोगी तुम मेरा कुमुद ? प्रश्न पूछती उसकी बड़ी निगाहें जब उसकी आँखों से टकराई तो एक अनजानी सी सिहरन हुई | यह कैसी डगर और यह नया हमराही ! कैसे कर पायेगी वो यह सब कुछ इस अनजाने से साथी के साथ ! पर गोपाल की आँखों में दिख रहे इतने प्यार ने जैसे सारे शक़ शुबहे दूर कर दिए और उसने धीरे से हाँ में सर हिलाया| गोपाल का चेहरा पास आता गया और कुमुद उसे महसूस करती गयी | सांसों की गर्मी पाकर रात पिघलती गयी |

सुबह का सूरज उसे अपनी जिम्मेदारियां समझाकर गया | तीन देवर ,बीमार ससुर और मुँह फुलाई सास के साथ उसकी गृहस्थी की गाड़ी जब चली तो बहुत सारे उतार चढाव से गुजरी | पहले कुमुद परेशां हो जाती ,इतना सारा काम और वो अकेली जान पर उसने देखा कि उससे सिर्फ चार साल बड़ा गोपाल बिना उफ़ किये अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा है तो वो इतनी कोमल कैसे रह सकती है ?

गलतियां करती ,डांट भी खाती पर फिर अपने साथी के साथ कदम से कदम बढ़ाये चलती जाती | पहली होली में सबके कपडे बने पर जब गोपाल उसे कपडे खरीदने ले गया तो अपनी पसंद पर अड़ी रहनेवाली कुमुद भूल गयी कि महंगी साड़ियां पहनने की शौक़ीन रही है वो ! दाम पूछकर हल्की साड़ी ही ली ,क्योकि गोपाल का संघर्ष अब उसका संघर्ष था |

पति की खरीदी सूती की वो लाल साड़ी कितनी बार अपने तन से लपेट कर देखा ,हर बार वो उसे अपनी खूबसूरती बढ़ाते हुए ही लगी | उसे तो गोपाल के कमरे में आने अहसास नहीं हुआ | हाथों में लाल चूड़ियां डालता हुआ उसका अनाड़ी पिया भावुक हो चला ” नयी नौकरी है ना और भाईयों की पढ़ाई भी ,एक दिन इन हाथों में सोने की चूड़ियां डालूंगा | “आपके प्यार से बड़ा कुछ नहीं ” कहकर अपनी पिया के काँधों से लग गयी कुमुद |

माँ का गुस्सा कभी कम नहीं हुआ | बेटे के सामने ठीक रहती पर उसके बाहर जाते ही उसपर टूट पड़ती | पति की लम्बी बीमारी ,हर दिन हाथ से निकलते खर्चे और अब घर में एक और नयी जिम्मेदारी कुमुद के रूप में ,खानेवाला एक और मुँह ! मज़ाल है कि गोपाल कुमुद को बाहर घुमाने की सोंचे और वो अड़ंगा नहीं लगाए | गोपाल उसका हाथ घर के कामों में हाथ बँटाये और उन्हें अपने लिए तभी कोई ज़रूरी काम ना याद आ जाये | कुमुद अब सब समझती थी पर गोपाल के तप से ऊपर कुछ नहीं था |

आज उसका भाई उसे मिलने आया था ,अपने साथ ढेर सारी सौगातें लेकर और गोपाल की अनुपस्थिति में सासु माँ ने सारे सामान खुलवा लिए थे और सारे मोहल्ले को इकट्ठा भी करके दिखाया था | उस दिन गोपाल ने माँ का मान तो रख लिया था पर खाना नहीं खाकर अपना गुस्सा दिखा दिया था | उसके बाद कभी सासु माँ ने ऐसी कोशिश कभी नहीं की |

जहाँ कुमुद के लिए सासु माँ का गुस्सा और ताने थोड़े कम हो चले थे वहीँ साथ में 3 सालों के अंतर में उसके दो देवरों को अच्छी जॉब लगी और दोनों अपने जॉब के लिए दूसरे शहर चले गए ,गोपाल की मेहनत रंग ला रही थी और कुमुद का खामोश तपस्या भी ! ऐसे में आयी रिया उनकी ज़िंदगी में नन्हें नन्हें क़दमों से !

अम्मा के दबे तानों ने फिर से अपना सर उठाया ” अपनी अम्मा की रीत अब यहीं शुरू होने वाली है अब ” ताना गोपाल के सामने ही दे दिया था और जवाब तुरंत मिला “मेरी बेटी मेरी पहचान है और इसके ख़िलाफ़ कोई बात सुनना पसंद नहीं करूँगा…….. किसी भी को हक़ नहीं ,मेरी बेटी बड़ी होकर मुझ सी ही डॉक्टर बनेगी | आपने कैसे मेरी बेटी का स्वागत ऐसे किया ? जैसे मैं आपका बेटा वैसे यह मेरी बेटी ……. आगे से यह ध्यान रहें | पत्नी का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा ” आज तुमने मुझे पिता बना दिया ,मेरा ओहदा बढ़ा दिया | ” आंखे नम हो चली थी |

अम्मा को आज अहसास हुआ कि शायद कुमुद ने गोपाल से कभी उनकी शिकायत नहीं की ,नहीं तो शायद गोपाल ऐसे चुप बैठने वाला नहीं था | बहुत इज़्ज़त करता था उनकी पर उन्हें पता था कि गलत बातें उसे बर्दाश्त नहीं | आज उन्हें अहसास हुआ कि इस छोटे कद की लड़की में बर्दाश्त बहुत है | अम्मा को इस सच्चाई ने शांत कर दिया था पर कभी कुमुद को दिल से स्वीकारा नहीं पर हाँ दोनों की बातचीत में अब इतनी कड़वाहट नहीं रही थी | गोपाल के सामने अम्मा मीठी बनी रहती और अकेले में दोनों के बीच अनौपचारिक बातें होतीं पर अब इनमें ताने शामिल नहीं थे | ज़िंदगी थोड़ी आसान हो चली थी |

इस बीच कुमुद के परिवार ने उसका साथ हमेशा दिया | जब पहली बार वो अपने घर गयी तो सीढ़ियां कितनी लम्बी लगी थी उसे ! खत्म ही नहीं हो रही थी ! ऊपर पहुंचते ही अम्मा उसके इंतज़ार में खड़ी थी और उन्होंने उसे कसकर चिपका लिया था | बहनों ने अपने उपहार की ज़िद की तो अम्मा ने चुपके से उसकी हाथों में पहले से उनके लिए उपहार दे दिए थे और बोल पड़ी ” देख लो दिदिया क्या लेकर आयी है तुम सबके लिए ! बहनें अपनी दीदी को छोड़ने को तैयार नहीं और अम्मा अपनी कुमुद से अकेले मिलने को बेक़रार !बड़ी मुश्किल से उन्हें कुमुद के लिए कुछ स्पेशल बनाने की बात कहकर रसोई में भेजा और अपनी लाडो को गले लगाकर आकुल होकर पूछ पड़ी ” कैसा है तेरा नया घर लाडो ?माँ को इतनी चिंता में देखकर बड़ी सहजता से झूठ बोल गयी कुमुद ” माँ घर छोटा है पर लोग बड़े दिल वाले है | सास तो बड़ा ध्यान रखती है ,बिलकुल तुम सी है माँ !

अपनी लाड़ो को समझने में माँ को ज़रा देर नहीं लगी | “अचानक बड़ी हो गयी है मेरी कुमुद ,मुझे पता है मेरी बेटी हीरा है हीरा ,एक दिन उन्हें भी समझ आएगा ,मैं हमेशा तेरे साथ हूँ ” कहकर गले लगा लिया उसे अम्मा ने | पर बाबा की जिम्मेदारियां बड़ी थी और अम्मा उनपर कुछ गलत किये का बोझ नहीं डालना चाहती थी तो कुमुद की तरह उन्होंने बाबा से भी सहजता से झूट बोल दिया और बाबा माँ की तरह नहीं थे तो समझ नहीं पाए कि बेटी सास के हाथों कैसी ज़िंदगी जी रही है? अम्मा ने अपना वादा निभाया ,कभी भाई के जरिये उसकी मनपसंद चीज़ें भेजकर ,कभी उसे अपने पास बुलाकर अपने गले लगाकर उसके आहत मन को एक राहत दे देती ,और वो फिर जुट जाती अपनी ज़िंदगी के ज़ंग में !

ऐसे कई और साल गुज़रे और सभी देवरों की जॉब भी लगी और शादियां भी हुई | गोपाल की भी प्रैक्टिस चल निकली | पर जब उनकी बहुएं आईं तो अम्मा को कुमुद की पहचान अच्छे से हुई | सारी बहुएँ खूबसूरत चुनकर लाई उन्होंने और समानो से घर भी भरें ,पर उन्हें अपनी ज़िंदगी जीनी थी और एक बूढी माँ की ज़िम्मेदारी ससुर के दुनियां से चले जाने के बाद किसी को भी नहीं लेनी थी और कुमुद ……. उसके स्वाभाव में रंच मात्र फर्क नहीं था |

ससुर जी के अंतिम पलों में कुमुद ही थी जिसने हर संभव उनकी सेवा की थी | आजकल सासु माँ भी बीमार चल रही थी तो उन्हें अपने पति के उन पलों की बड़ी याद आयी जब उनके बेटे काम पर गए होते और यह गैर लड़की उनकी दर्द से भरी पतली सी आवाज़ “बहु ” न जाने कैसे सुन लेती ” “जी बाउजी “कहकर उनके सामने खड़ी होती और एक अपराध बोध ने उन्हें घेर लिया ,आज उन्होंने हॉस्पिटल के बेड से अपनी कमज़ोर आवाज़ में उसे बुलाया और हमेशा की तरह वो हाज़िर “हाँ अम्मा जी ” | उसके हाथ बड़ी मुलायिमत से पकडे उन्होंने और इतने दिन का अपराधबोध शब्दों में फूटा ” बहु अपने स्वाभाव से तू सबसे बड़ी निकली ,तेरा मोल नहीं जाना मैंने कभी ,बेबात कोसती रही | सच कहते है बड़े घर की बेटी निकली संस्कारों में आज माफ़ कर दे मुझे नहीं तो ऊपरवाला के पास जाउंगी तो वो भी मुझे माफ़ नहीं करेगा ” दोनों हाथ से उनके हाथ थाम लिए कुमुद ने ” आप कहीं नहीं जा रही ,रिया के स्कूल में ग्रैंड पेरेंट्स डे है ,आपको जल्दी ठीक होना है “बस इतना ही बोल पाई वो | ठीक ही बोला उसने ,अम्मा आगे 6 साल और ज़िंदा रही और अपनी माँ से जैसे कुमुद ने कहा था कि सासु माँ एकदम तुम सी है वैसा ही हुआ |

आज सासु माँ को गए 2 साल हो गए | कुमुद के तीन बच्चे हो गए है | पति गोपाल आज नामी डॉक्टर है और कुमुद अपनी बागवानी में खुश है | पौधों से उसे शुरू से प्यार था ,उस शौक को उसने रोज़गार बना लिया है | दोनों मिलकर अपनी ज़िंदगी की गाड़ी अच्छे से चला रहें है | देवरों से मिलना जुलना हो जाता है | कुमुद का घर अब हवेली जितना बड़ा तो नहीं पर प्यार की दौलत से लबालब है | अम्मा की पुरानी कुर्सी पर हाथ पड़ते ही कुमुद की ऑंखें छलछला आयी |

” इन आँखो में आँसुंओं की कोई जगह न हो ,ऐसा ही कहा था न मैंने ,शायद कोई कमी रह गयी मेरे प्यार में ” गोपाल ने भरे मन से पूछा|

“नहीं जी ,आज अम्मा की याद आ गयी ,तो मन भर आया ” कुमुद का मन भारी हो चला|

“मम्मा देखो , अंशु ने मेरी किताबें छुपा दी है और रोहित मेरी सुन नहीं रहा ” रिया की आवाज़ आयी |

दोनों समझ गए कि दुनियां में उनका रोल अभी बाकि है ,अम्मा अब नहीं रही पर उनके बच्चों को अब भी उनकी ज़रूरत है ,उन्हें उनके लिए खुद को मज़बूत करना है ,ज़िंदगी आगे बढ़ानी है क्योकि ज़िंदगी नहीं रूकती ,सिलसिले नहीं थमते |

-अमृता श्री

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