उम्मीद की तुरपाई

तुमने बस सहेजा है ,
संभाला है ,
बांधा है ,
जोड़ा है ,
हर नाते ,हर रिश्ते को ,
प्यार से कमाया है ,
उम्मीद की तुरपाई से
सिल कर बचाया है !

तुमने जिंदगी को ,
कभी टांका है ,
कभी बाँधा है,
कभी धुप दिखाया है ,
कभी छांव में छिपाया है,
कभी बीनकर ,
कभी छांटकर
जीने लायक बनाया है |
हर नाते ,हर रिश्ते को ,
उम्मीद की तुरपाई से
सिल कर बचाया है !

अपने शौक को ,
बंद तिजोरी में सहेजकर ,
एक के सिक्के को ,
कल के लिए समेटकर ,
अपने बच्चों की आँखों में ,
ख़्वाब अपना सजाया है ,
हर नाते ,हर रिश्ते को ,
उम्मीद की तुरपाई से
सिल कर बचाया है !
या
या फिर कोई रिश्ता हो ,
जो दर्द दे रहा हो ,
जिसे झेलना हो मुश्किल ,
जो दंश दे रहा हो ,
पर
तुमने कहाँ सीखा है तोडना ?
तुमने तो बस सहेजा है ,
समेटा है ,
छिपाया है ,
दबाया है ,
उम्मीद की तुरपाई से
सिल कर बचाया है !
पर ,
क्या सब कुछ ऐसा अनवरत चलता जायेगा ?
सब्र उसका भी टूटेगा ,एक दिन ऐसा भी आएगा !
रोक लेना उस दिन को, अगर न रोक सके जो तुम ,
घर उस दिन तुम्हारा ,बस मकां रह जायेगा !

-अमृता श्री

woman in sari dress
Photo by Prabhash Sahu on Pexels.com

 

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7 Comments

  1. अमृता जी, नारी जीवन के मर्म के मोतियों को बहुत सूंदर शब्दो की माला में पिरोया है। निशब्द कर दिया आपने। बेहद खूबसूरत रचना। बधाई।

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