सैलाब

 

मैं इस बार जो टुटा तो एक सैलाब लेकर आऊंगा
कोई कह दे उससे कि ऐसे ना वो आजमाए मुझे !

उसके हाथों की लिखी चिट्ठियां दूर फेंक आया हूँ ,
हवाओं से कह दो ,अब न कोई पैगाम पहुंचाए मुझे !

हर बार उसकी बदजुबानी से बेक़सूरी ने सजा पाई है ,
रिश्तों का हवाला देकर अब न कोई समझाये मुझे !

झूठे वादों और कसमों पर जिंदगी गुजार ली मैंने ,
उसकी आँखों को कह दो अब तो न फुसलाये मुझे !
मुझे परवाह नहीं कि दुनियां को भरमा लिया तुमने ,
“श्री” अब तो बस मेरी बेबाकियाँ ही रास आये मुझे !

-अमृता श्री

 

sea waves
Photo by Arist Creathrive on Pexels.com
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