मुहब्बत!

मुहब्बत का ऐसा असर हो गया है ,
कि हर ओर बस तू ही तू रह गया है|

ज़िंदगी है बस एक सराब की मानिंद ,
और तू मेरा अब्र-ए-करम बन गया है !

इस काली रात के सन्नाटे है हर सू,
तू रोशनी में लिपटा सहर बन गया है |

बज़ाहिर ,तू है तो हासिल है सब कुछ ,
तू खुदा का मुझपे करम बन गया है|

-अमृता श्री

सराब- मृगतृष्णा
अब्र-ए-करम -बख़्शिश का बादल

सहर -सुबह
बज़ाहिर – यक़ीनन

tum

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