कब्ज़ा

वो जो तुम ,
नींद में भी ,
खिसककर जब
पास मेरे ,
आ जाती हो ,
मेरी बाँहों को
हक़ से तकिया ,
बनाकर, जब सो जाती हो ,
यार ऐसे तुम
मुझपर ,
हसीं कब्ज़ा जमा जाती हो !

वो जो तुम ,
जाते जाते कहीं ,
भागकर पास मेरे
आ जाती हो ,
बाँहों में अपनी बांधकर
गले मुझको ,
लगा जाती हो ,
शर्ट के बटन पर मेरे ,
अपने कुछ बाल,
उलझा जाती हो !
यार ऐसे तुम
मुझपर ,
हसीं कब्ज़ा जमा जाती हो !

वो जो तुम ,
हड़बड़ी में कभी,
तौलिये से मेरी ,
अपनी
एक्स्ट्रा लिपस्टिक हटा जाती हो ,
जाते जाते भी अपनी बिंदी ,
“याद दिलाएगी मेरी ” ,
कहकर शीशे पर,
हंसकर ,जब तुम लगा जाती हो ,
यार ऐसे तुम
मुझपर ,
हसीं कब्ज़ा जमा जाती हो !

–अमृता श्री

 

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