इंतज़ार

तुझमे देखा है ,एक दरिया भी और किनारा भी,
रिश्ता ही कुछ ऐसा है ,तुम्हारा भी ,हमारा भी !

बहती हुई हवाओं ने दरख्तों को चुपके से गवाही दी है ,
रिश्तो पर पड़ी रेत को हमने ,उड़ाया भी ,बहाया भी !

निश्चिन्त सफर करना इन कश्तियों के मुकद्दर में कहाँ ?
किनारों ने अक्सर, इनको डुबाया भी ,बचाया भी !

इंतज़ार में तेरी मुहब्बत ,”यकीं “बैचैन रहा रात भर,
याद ने उसकी आ -आकर, हंसाया भी, रुलाया भी !
-अमृता श्री

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