गरल की ये छोटी अदृश्य शीशियाँ !

गरल की कुछ छोटी अदृश्य शीशियाँ !

जन्म के साथ ही ईश्वर ने जैसे

हर हाथ में थमा डाली हों ,

गरल की कुछ छोटी अदृश्य शीशियाँ !

पीना पड़ता है ,घूंट घूंट ,

अपने हिस्से का ज़हर ,हर रोज़ ,हर बार !

बिना किसी आवाज़ के ,चुपचाप !

फिर अपने रुतबे पर इतराती हैं शीशियाँ ,

गरल की ये छोटी अदृश्य शीशियाँ !

हर को सम्भालनी होती है ,

अपनी यह थाती ,

दिनोदिन ये आकार बढाती जाती ,

गरल की ये छोटी अदृश्य शीशियाँ !

मुस्कुराहट की चाशनी में लपेट कर

,दर्द को हँसते हुए चेहरे में समेटकर !

ज़िंदगी का सफ़र बढ़ता है यूँ ही रेंग रेंग कर ,

बाज नहीं आती हैं फिर भी यह शीशियाँ ,

हर को सम्भालनी होती है ,

अपनी यह थाती ,

दिनोदिन ये आकार बढाती जाती ,

गरल की ये छोटी अदृश्य शीशियाँ !

कहीं जो कोई करने लगे

कभी विष वमन ,

जानना ,शायद उसका भी दग्ध

हो उठा हो व्यथित मन !

सोच कर ऐसा , गटक लेना कुछ बुँदे

उसके गरल की भी ,

कभी जो भर जाये तो

छलक उठती है शीशियाँ !

हर को सम्भालनी होती है

,अपनी यह थाती ,

दिनोदिन ये आकार बढाती जाती ,

गरल की ये छोटी अदृश्य शीशियाँ !

-अमृता श्री

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